‘लहरा दो तिरंगा’ मार्च पर पुलिस की रोक, कनॉट प्लेस में फ्लैश प्रोटेस्ट; ‘रेजिम चेंज’ के आरोपों पर भाजपा और विपक्ष आमने-सामने
रिपोर्ट: रघुबीर बंगारी
नई दिल्ली, 18 अक्टूबर। राजधानी दिल्ली में 16 अक्टूबर को प्रस्तावित ‘लहरा दो तिरंगा’ मार्च को लेकर दिनभर तनाव और राजनीतिक बयानबाजी का माहौल बना रहा। कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के संस्थापक अभिजीत दिपके को मार्च से कुछ समय पहले पुलिस ने हिरासत में ले लिया। अखिल भारतीय छात्र संघ (AISA) की अध्यक्ष नेहा बोरा को भी प्रदर्शन के दौरान हिरासत में लिया गया। इसके बावजूद कनॉट प्लेस और मध्य दिल्ली के अन्य इलाकों में प्रदर्शनकारियों ने तिरंगे के साथ छोटे-छोटे विरोध प्रदर्शन किए।
दिल्ली पुलिस ने नई दिल्ली जिले में 25 हजार से अधिक पुलिस और अर्धसैनिक बलों की तैनाती की थी। पुलिस का तर्क था कि बिना अनुमति प्रस्तावित जमावड़े से कानून-व्यवस्था और आम नागरिकों की आवाजाही प्रभावित हो सकती है। दूसरी ओर, प्रदर्शनकारियों ने तिरंगा फहराने और चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठाने के अपने अधिकार का हवाला दिया। अगले दिन, 17 अक्टूबर को, दिपके को शांति बनाए रखने की शर्त पर जमानत मिली और नेहा बोरा को भी रिहा कर दिया गया।
आधी रात के आरोप और पुलिस का नोटिस
घटनाक्रम 15 अक्टूबर की रात से शुरू हुआ। दिपके ने आरोप लगाया कि उनके ठहरने के स्थान के आसपास खुफिया एजेंसियों के लोग निगरानी कर रहे थे और एक सफेद स्कॉर्पियो उनका पीछा कर रही थी। उन्होंने कहा कि पुलिस की कार्रवाई के बावजूद वे कनॉट प्लेस में तिरंगा फहराने के अपने आह्वान से पीछे नहीं हटेंगे। निगरानी संबंधी ये दावे उनके आरोप थे; इनकी स्वतंत्र पुष्टि सामने नहीं आई।
16 अक्टूबर को दिल्ली पुलिस की एक टीम दिपके के ठहरने के स्थान पर पहुंची और उन्हें औपचारिक नोटिस दिया। नोटिस में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 के तहत लागू निषेधाज्ञा और नई दिल्ली नगरपालिका परिषद (NDMC) से अनुमति नहीं मिलने का हवाला देते हुए प्रस्तावित कार्यक्रम वापस लेने को कहा गया।
दिपके ने इस कार्रवाई पर सवाल उठाया। उनका कहना था कि तिरंगा फहराने की अपील को रैली या कानून-व्यवस्था के लिए खतरे के रूप में क्यों देखा जा रहा है। पुलिस ने हालांकि सार्वजनिक व्यवस्था, यातायात और व्यापारिक गतिविधियों पर संभावित असर को अपनी कार्रवाई का आधार बताया।
कनॉट प्लेस में कड़ी सुरक्षा, फिर भी हुए प्रदर्शन
प्रस्तावित मार्च से पहले कनॉट प्लेस और आसपास के इलाकों में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई। प्रमुख सड़कों पर बैरिकेडिंग की गई और सेंट्रल पार्क तथा राजीव चौक मेट्रो स्टेशन के आसपास निगरानी बढ़ाई गई। प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लेने के लिए बसों की व्यवस्था भी की गई थी।
शाम करीब पांच बजे मार्च के लिए निकलते समय दिपके को हिरासत में ले लिया गया। उनके समर्थकों और पुलिस के बीच बहस के दृश्य भी सामने आए। इसके बाद अलग-अलग स्थानों पर छोटे समूहों ने तिरंगा लेकर नारेबाजी की और विरोध प्रदर्शन किए।
नेहा बोरा ने मंडी हाउस की ओर से मार्च निकालने का प्रयास किया, लेकिन पुलिस ने उन्हें और अन्य प्रदर्शनकारियों को हिरासत में ले लिया। कुछ स्थानों पर पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच धक्का-मुक्की की खबरें भी आईं। दिनभर की कार्रवाई में 100 से अधिक प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिए जाने की खबर प्रकाशित हुई।
प्रदर्शन के पीछे क्या है विवाद?
CJP और उससे जुड़े संगठनों के विरोध का प्रमुख मुद्दा मतदाता सूचियों का विशेष गहन पुनरीक्षण यानी Special Intensive Revision (SIR) और मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार की भूमिका है। प्रदर्शनकारी चुनावी प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं का आरोप लगाते हुए उनके इस्तीफे की मांग कर रहे हैं।
CJP के दो नेताओं सौरव दास और आशुतोष रांका की गिरफ्तारी के विरोध में भी ‘लहरा दो तिरंगा’ मार्च का आह्वान किया गया था। इन नेताओं को जंतर-मंतर पर कथित रूप से अनधिकृत प्रवेश और बिना अनुमति तिरंगा फहराने के आरोपों के बाद हिरासत में लिया गया था।
प्रदर्शनकारियों का कहना है कि उनका आंदोलन लोकतांत्रिक अधिकारों और चुनावी पारदर्शिता की मांग से जुड़ा है। वहीं, प्रशासन ने बिना अनुमति भीड़ जुटाने और सार्वजनिक व्यवस्था प्रभावित होने की आशंका को कार्रवाई का आधार बताया है। चुनावी अनियमितताओं से जुड़े आरोपों को लेकर निर्वाचन आयोग का पक्ष और उपलब्ध आधिकारिक आंकड़े अलग से देखना जरूरी है।
‘रेजिम चेंज’ पर राजनाथ सिंह का विपक्ष पर निशाना
सड़कों पर विरोध के बीच राजनीतिक टकराव भी तेज हो गया। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने लखनऊ में विपक्ष पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि कुछ लोग बांग्लादेश जैसे घटनाक्रम की तर्ज पर भारत में भी सत्ता परिवर्तन का माहौल बनाना चाहते हैं।
यह बयान उस बहस के बीच आया, जिसमें AISA अध्यक्ष नेहा बोरा की बांग्लादेश के छात्र आंदोलन से प्रभावित होने संबंधी टिप्पणी और वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण के सत्ता परिवर्तन से जुड़े वक्तव्य चर्चा में थे। भूषण का तर्क था कि लोकतंत्र में विपक्ष का उद्देश्य चुनाव के माध्यम से सत्ता परिवर्तन करना होता है।
भाजपा नेताओं ने इन बयानों को आंदोलन के राजनीतिक उद्देश्य से जोड़कर सवाल उठाए। विपक्ष ने पलटवार करते हुए कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार बदलने की मांग करना असंवैधानिक नहीं है और चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठाना विपक्ष की भूमिका का हिस्सा है।
इस तरह विवाद केवल तिरंगा मार्च या पुलिस कार्रवाई तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह बहस भी तेज हो गई कि चुनावी संस्थाओं की आलोचना, विरोध प्रदर्शन और सत्ता परिवर्तन की मांग को किस सीमा तक राजनीतिक या लोकतांत्रिक अधिकार के रूप में देखा जाना चाहिए।