उत्तराखण्ड की पहचान हिमालय, पवित्र नदियों और तीर्थस्थलों के साथ-साथ उसकी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, आध्यात्मिक चेतना और संस्कारों से भी है। ऐसे में देवभूमि की युवा पीढ़ी को नशे से दूर रखकर स्वस्थ, शिक्षित, संस्कारवान और आत्मनिर्भर बनाना समय की आवश्यकता है। नशे की बढ़ती प्रवृत्ति पर चिंता व्यक्त करते हुए शिक्षा एवं सहकारिता मंत्री डॉ. धन सिंह रावत ने पर्वतपल्स के संवाददाता से विशेष मुलाकात में कहा कि नशामुक्त उत्तराखण्ड का निर्माण केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि परिवार, शिक्षण संस्थानों, सामाजिक संगठनों और प्रत्येक नागरिक का साझा दायित्व है।
डॉ. रावत ने कहा कि नशा केवल व्यक्ति के स्वास्थ्य को प्रभावित नहीं करता, बल्कि उसके पारिवारिक जीवन, सामाजिक संबंधों और भविष्य की संभावनाओं पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालता है। युवा किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी शक्ति होते हैं। उनकी ऊर्जा, प्रतिभा और रचनात्मकता का उपयोग शिक्षा, खेल, नवाचार, कौशल विकास और राष्ट्रनिर्माण में होना चाहिए।
उन्होंने कहा कि नशे के विरुद्ध संघर्ष को केवल नारों, भाषणों और कानूनों तक सीमित नहीं रखा जा सकता। इसके लिए समाज की सोच में सकारात्मक बदलाव लाना होगा। परिवारों में जागरूकता, शिक्षण संस्थानों में संस्कार और युवाओं के जीवन में सकारात्मक उद्देश्यों का समावेश आवश्यक है। हमारा प्रयास ऐसा वातावरण तैयार करना होना चाहिए, जिसमें युवा नशे से दूर रहकर अपनी क्षमताओं का बेहतर उपयोग कर सकें।
व्यक्तिगत आचरण से ही बनती है प्रेरणा
व्यक्तिगत जीवन में अनुशासन और संयम के महत्त्व पर चर्चा करते हुए डॉ. रावत ने कहा कि उनका स्वयं का प्रयास व्यसनों से दूर रहने का रहा है। वे चाय का सेवन भी नहीं करते। उनके अनुसार, स्वस्थ जीवनशैली का संदेश केवल दूसरों को देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसे अपने आचरण में भी अपनाना चाहिए।
उन्होंने स्पष्ट किया कि नशे की समस्या को केवल इच्छाशक्ति की कमी मानना उचित नहीं होगा। इसके पीछे मानसिक तनाव, सामाजिक परिस्थितियाँ, गलत संगति और कई अन्य कारण हो सकते हैं। इसलिए युवाओं को जागरूक करने के साथ उनकी समस्याओं को समझना, उनसे संवाद करना और आवश्यकता पड़ने पर उचित परामर्श, उपचार तथा पुनर्वास की सुविधा उपलब्ध कराना भी जरूरी है।
उन्होंने कहा कि सार्वजनिक जीवन में व्यक्ति का आचरण उसके विचारों की विश्वसनीयता को मजबूत करता है। हमारा उद्देश्य किसी पर विचार थोपना नहीं, बल्कि लोगों को प्रेरित कर स्वस्थ और संयमित जीवनशैली अपनाने के लिए प्रोत्साहित करना होना चाहिए।
शिक्षण संस्थान निभाएँ निर्णायक भूमिका
शिक्षा और संस्कारों को नशामुक्ति का मजबूत आधार बताते हुए डॉ. रावत ने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल डिग्री हासिल करना या रोजगार प्राप्त करना नहीं है। शिक्षा व्यक्ति में विवेक, आत्मविश्वास, नैतिकता और सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना विकसित करती है। विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में विद्यार्थियों के साथ नियमित संवाद स्थापित किया जाना चाहिए। नशे के दुष्परिणामों के प्रति जागरूकता बढ़ाने के साथ खेलकूद, योग, सांस्कृतिक गतिविधियों, रचनात्मक कार्यों और कौशल विकास को प्रोत्साहित करना आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि अभिभावकों और शिक्षकों को बच्चों के व्यवहार में होने वाले बदलावों को संवेदनशीलता से समझना चाहिए। भय, अपमान और केवल दंड से हर समस्या का समाधान संभव नहीं है। विश्वास, संवाद और समय पर मार्गदर्शन युवाओं को कठिन परिस्थितियों से बाहर निकलने में मदद कर सकते हैं।
डिजिटल माध्यमों की भूमिका पर उन्होंने कहा कि आज सोशल मीडिया और अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म युवाओं के जीवन का महत्त्वपूर्ण हिस्सा हैं। इनका उपयोग नशे के विरुद्ध जागरूकता फैलाने, प्रेरक संदेशों के प्रसार और सकारात्मक गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए किया जाना चाहिए। युवाओं को केवल जागरूकता कार्यक्रमों का श्रोता नहीं, बल्कि नशामुक्त समाज के निर्माण का सक्रिय भागीदार बनाना होगा।
कार्रवाई के साथ उपचार और पुनर्वास भी जरूरी
डॉ. रावत ने कहा कि नशामुक्त उत्तराखण्ड के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए सरकार, प्रशासन, शिक्षण संस्थानों, सामाजिक संगठनों और परिवारों के बीच प्रभावी समन्वय जरूरी है। नशीले पदार्थों की अवैध आपूर्ति और तस्करी पर प्रभावी नियंत्रण के साथ जनजागरूकता, परामर्श, उपचार और पुनर्वास की व्यवस्थाओं को भी प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
उन्होंने कहा कि नशे की समस्या से जूझ रहे व्यक्तियों को सामाजिक उपेक्षा के बजाय सहायता और सम्मानजनक जीवन की ओर लौटने का अवसर मिलना चाहिए। नशामुक्ति का उद्देश्य केवल व्यसन से दूरी बनाना नहीं, बल्कि व्यक्ति को स्वस्थ, आत्मनिर्भर और सकारात्मक जीवन जीने में सक्षम बनाना भी है।
उनके अनुसार, परिवार इस दिशा में सबसे महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। माता-पिता बच्चों से संवाद बनाए रखें, उनकी समस्याओं को समझें और उन्हें सकारात्मक गतिविधियों के लिए प्रोत्साहित करें। समाज को भी युवाओं के लिए खेल, सांस्कृतिक कार्यक्रमों, कौशल विकास और रोजगारोन्मुख अवसरों का विस्तार करने में योगदान देना चाहिए।
सफलता का आकलन ठोस परिणामों से हो
नशामुक्ति अभियान की प्रभावशीलता पर जोर देते हुए डॉ. रावत ने कहा कि ऐसे प्रयासों की सफलता का आकलन केवल आयोजित कार्यक्रमों या जागरूकता रैलियों की संख्या से नहीं होना चाहिए। यह देखना भी आवश्यक है कि जागरूकता कार्यक्रम कितने निरंतर हैं, प्रभावित व्यक्तियों को कितनी सहायता मिल रही है, अवैध नशीले पदार्थों के विरुद्ध कार्रवाई कितनी प्रभावी है और युवा इस अभियान में किस स्तर पर भागीदारी कर रहे हैं।
उन्होंने कहा कि नशामुक्ति के प्रयासों को दीर्घकालिक दृष्टिकोण के साथ आगे बढ़ाने की आवश्यकता है। जागरूकता, रोकथाम, समय पर सहायता और पुनर्वास को एक-दूसरे से जोड़कर ही स्थायी परिणाम प्राप्त किए जा सकते हैं।
नशामुक्त देवभूमि आने वाली पीढ़ियों के प्रति हमारा दायित्व
अपनी बात के समापन में डॉ. धन सिंह रावत ने अभिभावकों, शिक्षकों, युवाओं, सामाजिक संगठनों और जनप्रतिनिधियों से नशे के विरुद्ध सक्रिय भूमिका निभाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि देवभूमि उत्तराखण्ड की वास्तविक शक्ति यहाँ के जागरूक नागरिकों, संस्कारवान परिवारों और ऊर्जावान युवाओं में निहित है।
यदि युवा पीढ़ी को सही दिशा, सकारात्मक अवसर और स्वस्थ वातावरण उपलब्ध कराया जाए, तो नशे के विरुद्ध संघर्ष को व्यापक सामाजिक आंदोलन का रूप दिया जा सकता है। हमारा लक्ष्य ऐसा उत्तराखण्ड होना चाहिए, जहाँ युवा अपनी प्रतिभा पर विश्वास करें, परिवार सुरक्षित और सशक्त हों तथा शिक्षा के साथ संस्कारों को भी समान महत्त्व मिले।
डॉ. रावत ने कहा कि “नशे से दूरी, जीवन से जुड़ाव और व्यसन से मुक्ति, विवेक का विकास—इसी विचार के साथ हमें नशामुक्त, स्वस्थ, शिक्षित और संस्कारवान देवभूमि के निर्माण के लिए आगे बढ़ना होगा। यह केवल किसी एक व्यक्ति का संकल्प नहीं, बल्कि हमारी आने वाली पीढ़ियों के प्रति हम सभी का सामूहिक दायित्व है।”